Border 2 Movie Review in Hindi: कहानी, कलाकार, दर्शकों की प्रतिक्रिया और बॉक्स ऑफिस उम्मीदें
कुछ फिल्में धमाकों से शुरू नहीं होतीं, बल्कि एक एहसास से शुरू होती हैं। बॉर्डर 2 भी ऐसी ही फिल्म है। यह फिल्म पहले ही सीन में साफ कर देती है कि यह सिर्फ पुरानी यादों को भुनाने की कोशिश नहीं है, बल्कि युद्ध के पीछे छिपी सच्चाइयों को फिर से समझाने का प्रयास है। यह कहानी सिर्फ दुश्मन को हराने की नहीं, बल्कि उस कीमत की है जो सैनिक और उनके परिवार चुकाते हैं।

📖 कहानी
फिल्म की कहानी 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय की है, जब देश एक साथ ज़मीन, आसमान और समुद्र—तीनों मोर्चों पर लड़ रहा था। 1997 की बॉर्डर जहाँ एक ही युद्धभूमि पर केंद्रित थी, वहीं बॉर्डर 2 अपने दायरे को बड़ा करती है। यह फिल्म धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और पहले अपने किरदारों को इंसान के रूप में सामने रखती है—ऐसे इंसान जिनके अपने डर हैं, घर की यादें हैं और अधूरे सपने हैं।
BORDER 2 (Teaser): Sunny Deol, Varun D, Diljit, Ahan | Anurag S | JP Dutta, Bhushan K | 23-Jan-2026
ज़मीनी मोर्चे पर तैनात भारतीय सेना की एक टुकड़ी ऐसी जगह पर फँसी होती है, जहाँ से पीछे हटने का मतलब आम लोगों को मौत के मुँह में धकेलना है। हालात उनके पक्ष में नहीं हैं—न हथियार पूरे हैं, न मदद पास है—फिर भी वे डटे रहते हैं, क्योंकि देश की सीमा सिर्फ नक्शे की रेखा नहीं होती, वह ज़िम्मेदारी होती है।
आसमान में, भारतीय वायुसेना का एक पायलट अचानक हुए हमले के बीच एयरबेस की रक्षा करता है। यहाँ युद्ध तेज़ है, अकेला है और बेहद निर्दयी। फिल्म इन पलों में यह दिखाने में सफल रहती है कि कुछ फैसले सेकंडों में लिए जाते हैं, लेकिन उनके असर पीढ़ियों तक रहते हैं।
समंदर में चल रही नौसेना की कार्रवाई फिल्म का सबसे शांत लेकिन सबसे जोखिम भरा हिस्सा है। यह कहानी बताती है कि युद्ध केवल सामने दिखने वाली गोलियों से नहीं जीता जाता, बल्कि उन मिशनों से भी जीता जाता है जिनके बारे में आम लोग कभी जान ही नहीं पाते।
फिल्म की सबसे अच्छी बात यह है कि ये तीनों कहानियाँ ज़बरदस्ती आपस में नहीं टकरातीं। वे साथ-साथ चलती हैं, एक ही भावना को साझा करती हुई—देश के लिए कुछ भी कुर्बान कर देने की भावना।
सनी देओल इस बार पुराने अंदाज़ में गरजते नहीं हैं। उनका किरदार ज़्यादा गंभीर, ज़्यादा ठहरा हुआ और ज़्यादा सच्चा लगता है—जैसे कोई ऐसा इंसान जिसने बहुत कुछ देख लिया हो। वरुण धवन अपने अब तक के करियर से अलग, बेहद संयमित अभिनय करते हैं। उनका किरदार चुप्पियों के ज़रिये ज़्यादा बोलता है। दिलजीत दोसांझ फिल्म की भावनात्मक रीढ़ बनते हैं। उनका अभिनय सादा है, लेकिन असरदार।
फिल्म का संगीत देशभक्ति दिखाने के लिए नहीं, बल्कि महसूस कराने के लिए इस्तेमाल किया गया है। गाने कहानी के बीच नहीं घुसते, बल्कि उसके साथ बहते हैं। बैकग्राउंड म्यूज़िक वहाँ ऊँचा होता है जहाँ तनाव है, और वहाँ खामोश हो जाता है जहाँ दर्द है।
तकनीकी तौर पर फिल्म भव्य है, हालाँकि कुछ वीएफएक्स सीन पूरी तरह से भरोसा नहीं जगा पाते। लेकिन ज़मीन पर लड़े गए युद्ध के दृश्य इतने सच्चे लगते हैं कि ये कमियाँ पीछे छूट जाती हैं। फिल्म युद्ध को ग्लैमराइज़ नहीं करती—यह उसे डरावना, भारी और थका देने वाला दिखाती है।
🎭 कलाकार और अभिनय
सनी देओल
इस बार वह पहले की तरह ज़ोर-ज़ोर से देशभक्ति नहीं बोलते। उनका किरदार शांत, परिपक्व और अनुभव से भरा हुआ लगता है—जैसे किसी ऐसे इंसान का, जिसने बहुत ज़्यादा युद्ध देख लिया हो। उनकी मौजूदगी फिल्म में गंभीरता और पुरानी बॉर्डर की यादें दोनों जोड़ती है।
वरुण धवन
उम्मीद से कहीं बेहतर। वह एक अनुशासित सेना अधिकारी की भूमिका निभाते हैं, जहाँ उनका अभिनय संवादों से ज़्यादा बॉडी लैंग्वेज और खामोशी के ज़रिये सामने आता है। यह उनके करियर की गंभीर भूमिकाओं में से एक है।
दिलजीत दोसांझ
फिल्म का भावनात्मक स्तंभ। वायुसेना पायलट के रूप में उनका अभिनय संतुलित और सम्मानजनक है। वह ओवरएक्ट नहीं करते, जिससे उनका किरदार और प्रभावशाली बनता है।
अहान शेट्टी
नौसेना पक्ष का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी भूमिका ताज़गी लाती है, हालांकि स्क्रीन टाइम अन्य कलाकारों की तुलना में थोड़ा कम है।
महिला किरदार
ये सिर्फ गानों के लिए नहीं हैं। ये घर पर इंतज़ार, अनिश्चितता और भावनात्मक दबाव को दर्शाते हैं—जिसे युद्ध फिल्में अक्सर नज़रअंदाज़ कर देती हैं।
🎶 संगीत और बैकग्राउंड स्कोर
फिल्म का संगीत चार्ट हिट बनने के लिए नहीं, बल्कि भावनाओं को छूने के लिए बनाया गया है।
गाने बलिदान, मिट्टी और बिछड़ने की पीड़ा पर केंद्रित हैं, न कि रोमांस पर।
युद्ध दृश्यों में बैकग्राउंड स्कोर भारी है और भावनात्मक पलों में शांत—जो प्रभावी लगता है।
एक देशभक्ति गीत पहले ही काफ़ी लोकप्रिय हो चुका है, खासकर राष्ट्रीय अवसरों पर।
🎥 निर्देशन और दृश्य
युद्ध के दृश्य बड़े पैमाने पर फिल्माए गए हैं, हालांकि कुछ वीएफएक्स शॉट्स थोड़े बनावटी लग सकते हैं।
वास्तविक एक्शन सीन, सीजीआई की तुलना में ज़्यादा दमदार महसूस होते हैं।
निर्देशक का ध्यान स्टाइलिश एक्शन से ज़्यादा भावनाओं और यथार्थ पर है।
यह कोई चमक-दमक वाली युद्ध फिल्म नहीं है। यह धूल भरी, शोरगुल वाली और तनावपूर्ण है—यानी हकीकत के क़रीब।
👥 दर्शकों की प्रतिक्रिया
कई दर्शक इस बात की सराहना कर रहे हैं कि फिल्म हिंसा को महिमामंडित करने के बजाय सैनिकों का सम्मान करती है।
बॉर्डर (1997) के प्रशंसक भावनात्मक रूप से इससे जुड़ाव महसूस कर रहे हैं।
खासकर दिलजीत दोसांझ और सनी देओल के अभिनय की तारीफ हो रही है।
वहीं कुछ लोगों को लगता है कि फिल्म पुरानी शैली की देशभक्ति पर ज़्यादा निर्भर करती है।
कुछ दर्शकों को बड़े बजट के हिसाब से वीएफएक्स बेहतर होने की उम्मीद थी।
युवा दर्शकों को फिल्म का पहला भाग थोड़ा धीमा लग सकता है।
कुल मिलाकर, प्रतिक्रिया भावनात्मक रूप से मज़बूत लेकिन बंटी हुई है।
बॉर्डर 2 तालियाँ बटोरने वाली फिल्म नहीं है। यह याद दिलाने वाली फिल्म है। यह हमें उन चेहरों के बारे में सोचने पर मजबूर करती है जो हमारी नींद के दौरान भी जागते रहते हैं, ताकि हम सुरक्षित रह सकें।
और शायद, एक युद्ध फिल्म के लिए इससे बड़ा मकसद कोई और हो ही नहीं सकता।
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